Wednesday, 27 September 2017

में पुलिस हूँ👮🏼मैं क्या लिखूँ? 😥😥
4×4 की गुमटी में घुटती जिन्दगी की दास्तान लिखूँ ।
या सुनसान सड़कों पर उस बेहूदा सीटी के बयान लिखूँ ।।
मैं क्या लिखूँ? 
बहन कहती है रक्षाबंधन में घर आ जाता
तो अच्छा रहता,
बीवी कहती है करवाचौथ में घर आ जाता 
तो अच्छा रहता,
माँ हर शाम कहती है घर आ जाता
तो अच्छा रहता ।
मेरी माँ जानती है,नहीं आयेगा फिर भी
नजरें गड़ाये बैठी हैं ।
उन धुँधलाती आँखों का इन्तजार मैं कैसे लिखूँ ।।
मैं क्या लिखूँ? 
थक गयी है मेरी सीटी VIP को पास कराते-कराते ।
जिन्दगी सिमट सी गयी है राइफल पर सीलिंग चढाते-2।।
गोली चली तो क्यों चली नहीं चली तो क्यों नहीं चली ,
बड़ी बिडमबना है मेरे दोस्त, 
इस बेरहम कानून को मैं कैसे महान लिखूँ ।
मैं क्या लिखूँ ?
वो जीडी की चन्द लाइनें कल भी दहलाती थीं 
आज भी दहलाती हैं ।
वो संगीन के साये मे खड़ा सिपाही छुट्टी के लिए 
कल भी रोता था आज भी रोता हैं ।।
वो मैस की जली भुनी रोटीयाँ और दाल में पानी का स्तर 
कल भी उतना ही था आज भी उतना ही हैं ।
कुछ नहीं बदला सिवाय चेहरों के यहाँ 
इस अदभुत कब्र में कैद हैं हम 
इसे मैं कैसे मजार लिखूँ ।

मैं क्या लिखूँ ?
मैं क्या लिखूँ? 
🙏🏽🙏🏽🙏🏽

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